
हवाओं के सुरों पर , सिहरन की तरह
गर्म फिजाओं में , ठिठुरन की तरह
सूरज की तपिश में , बर्फीली छुअन सा
दूर कहीं कोएल की , कूक सा
कानों में बजती , बाँसुरी सा
धड़कन में बजती , रागिनी सा
आगोश में भरकर , छूकर जो निकला
कहीं यह रोमांस तो नहीं .......
लबो पे जिसके कभी बद्दुआ नहीं होती
वो माँ है जो कभी खफा नहीं होती
जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है